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 करोड़ों खर्च के बाद भी कबाड़ बने सोलर प्लांट, रोशनी को तरस रहे दो दर्जन गांव के लोग

सूरजपुर। आज़ादी के 77 साल गुजर गए, लेकिन जिले के दूरस्थ चांदनी बिहारपुर अंचल के हजारों ग्रामीण अब भी अंधेरे में जीने को मजबूर हैं। मध्यप्रदेश के सिंगरौली सीमा से सटे इन पहाड़ी और वनांचल गांवों में अब तक स्थायी बिजली नहीं पहुंची।
बिजली सुविधा से वंचित करीब दो दर्जन गांवों के लोग आज भी दीपक, लालटेन और ढिबरी पर निर्भर हैं। बच्चों की पढ़ाई ठप है, त्योहार अंधेरे में मनाने पड़ते हैं और रात में जंगली जानवरों का खतरा ग्रामीणों की जान पर हमेशा बना रहता है। ग्रामीणों को रोशनी देने के लिए सरकार ने करोड़ों की लागत से सोलर पावर प्लांट और सोलर होम लाइट लगवाए थे। लेकिन यह योजना अब मजाक बनकर रह गई है।
बैटरी और इनवर्टर खराब होने से अधिकांश पावर प्लांट कबाड़ बन गए है। सैकड़ों सोलर होम लाइट के मदरबोर्ड और बल्ब खराब पड़े है। चुनिंदा 2–4 पावर प्लांट ही किसी तरह चल पा रहे हैं। गांवों में स्थापित संरचनाएं बिना रखरखाव के धूल फांक रही हैं। ग्रामीणों का कहना है कि “सरकार ने सिर्फ फोटो खिंचवाकर काम दिखाया, लेकिन स्थायी समाधान कभी नहीं दिया।”

0अंधेरे से वन्यप्राणियों का खतरा

चांदनी बिहारपुर अंचल से सटा गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान रात के अंधेरे में जान का सबसे बड़ा खतरा बन गया है। हाथी अक्सर गांवों में घुस आते हैं और घर तोड़ देते हैं। कई बार भालू और बाघ भी घरों के पास दिखाई देते हैं।
जहरीले सांप और कीड़े-मकोड़े घरों तक पहुंच जाते हैं।।ग्रामीण बताते हैं कि अंधेरे में हर दिन मौत का डर बना रहता है।

0 अंधेरे में त्योहार, शिक्षा पर ताला

यहां के आदिवासी और गरीब परिवार दशकों से त्योहार अंधेरे में मना रहे हैं। दीपावली, होली, गणेश चतुर्थी और अन्य पर्व गांवों में बिना रोशनी के बीत जाते हैं। आधुनिकता के इस युग मे
बच्चे ढिबरी और लकड़ी की मशाल जलाकर पढ़ाई करते हैं।
महिलाएं रसोई और घर के कामकाज अंधेरे में करती हैं।
बुजुर्ग और बच्चे जंगली जानवरों के डर में जीते हैं। शिक्षा पर इसका गहरा असर पड़ रहा है। बिजली न होने से न तो बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई कर पा रहे हैं और न ही गांवों में कंप्यूटर शिक्षा संभव है।

0 आधुनिक खेती से वंचित किसान

बिजली की सुविधा न होने से यहां के किसान आधुनिक खेती से वंचित हैं। सिंचाई के लिए पंप नहीं चल पाते तो खेतों में पैदावार घट रही है। रोजगार का साधन भी सीमित है। आदिवासी पंडो परिवार मजबूरन बाहर मजदूरी करने जाते हैं। ग्रामीणों ने कहा कि“पंडो राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहलाते हैं, लेकिन उन्हें भी आज तक रोशनी नसीब नहीं हुई।”

0 टिमटिमाती रौशनी के लिए तरस रहे ये गांव

दुरस्त अंचल के इन गांवों के लोगो को रौशनी का इंतजार है। जिनमे महुली, कोल्हुआ, भाटपारा, पंडोबस्ती, बोकराटोल, चोगा, करौटी, खैरा, कछिया, नवडीहा, बसनरा, कैलासनगर, भूसकी, जल्हा, छतरग, बाक, असुरा, मोहरसोप, जूडवनीया, कछवारी, रामगढ़, बलीयरी, उमझर, रसोकी, खोहीर, बैजनपाठ, लुल्ह, भून्डा, तेलाईपाठ, महुली के पहाड़पारा, हरजन पारा, खास पारा, पंडोपारा, कबीरदास पारा समेत दो दर्जन से अधिक गांव शामिल है।

0 यह विकास नहीं, बदहाली है

ग्राम महुली के सरपंच रनसाय सिंह बताते है कि महुली के पहाड़पारा और कई टोले आज भी अंधेरे में हैं। सोलर प्लांट धूल खा रहे हैं, कोई मरम्मत नहीं हो रहा है। कोल्हूआ सरपंच कहते है कि आसपास के गांवों में बच्चे ढिबरी की रोशनी में पढ़ते हैं। यह विकास नहीं, बदहाली है।”
ग्राम पंचायत खोहीर सरपंच तेजबली चेरवा ने कहा कि
“हमने कई बार अधिकारियों और नेताओं से गुहार लगाई, लेकिन बिजली देने के नाम पर सिर्फ आश्वासन ही मिला। रामगढ़ सरपंच सोनू सिंह का कहना गई कि त्योहार और रोज़मर्रा की जिंदगी अंधेरे में कट रही है। जंगली जानवरों से हर वक्त खतरा है। करौटी ए सरपंच गजमोचन सिंह की माने तो
“करौटी, चोगा, खैरा, कछिया जैसे गांव बिजली के इंतजार में हैं। नेताओं को सिर्फ वोट चाहिए, जिसके बाद उन्हें ग्रामीणों की समस्याओं से कोई लेना देना नहीं है। कांग्रेस कमेटी महुली अध्यक्ष शिशुपाल जायसवाल ने कहा कि
“भाजपा सरकार ने वनांचल के लोगों के साथ धोखा किया है। बिजली और सड़क देने का वादा सिर्फ चुनावी भाषणों तक सीमित है। जितेन्द्र साकेत कहते है कि 77 साल बाद भी ढिबरी और लालटेन पर गांव निर्भर हैं। अगर सरकार ने जल्द कदम नहीं उठाया तो बड़ा आंदोलन होगा।

0 वादे है वादों का क्या

हर चुनाव में नेताओं और मंत्रियों ने सड़क, पानी और बिजली देने का वादा किया, लेकिन हकीकत यह है कि ग्रामीण आज भी अंधेरे में हैं। ग्रामीणों का कहना है के8

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