कुलपति से पीएचडी प्रवेश परीक्षा आयोजित करने की मांग

अंबिकापुर। संत गहिरा गुरु विश्वविद्यालय प्रशासन के समक्ष आजाद सेवा संघ के प्रदेश सचिव रचित मिश्रा ने शोधार्थियों के भविष्य से जुड़े अत्यंत संवेदनशील विषय पर अपना पक्ष रखते हुए कुलपति को पत्र लिखकर सत्र 2026 में पी.एच.डी. प्रवेश परीक्षा को अनिवार्य रूप से आयोजित करने की मांग की है। उन्होंने अपने पत्र में विश्वविद्यालय की वर्तमान कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए इसे उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ी बाधा और शोधार्थियों के साथ घोर अन्याय बताया है।
रचित मिश्रा ने तथ्यों के साथ अपनी बात रखते हुए कहा है कि विश्वविद्यालय द्वारा अंतिम बार 10 नवंबर 2023 को पी.एच.डी. प्रवेश हेतु आवेदन आमंत्रित किए गए थे और 10 दिसंबर 2023 को इसका सफलतापूर्वक आयोजन किया गया था। उस समय की पारदर्शी और योग्यता आधारित प्रक्रिया ने विश्वविद्यालय की शैक्षणिक छवि को नई ऊंचाइयां दी थी। इसके पश्चात वर्ष 2026 का प्रथम त्रैमासिक समाप्त होने को है, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन ने दोबारा इस परीक्षा की सुध लेना आवश्यक नहीं समझा। 2023 से 2026 के बीच तीन वर्षों का लंबा अंतराल न केवल शैक्षणिक कैलेंडर का उल्लंघन है, बल्कि उन हजारों प्रतिभावान छात्रों के सपनों के साथ खिलवाड़ है, जो लंबे समय से शोध कार्य की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि 2026 में भी परीक्षा आयोजन के संबंध में किसी भी प्रकार की आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं की गई है, जिससे प्रदेश के छात्र-छात्राओं के मध्य गहन अनिश्चितता और असमंजस की स्थिति है। एक ओर जहां सरकार उच्च शिक्षा और शोध को बढ़ावा देने की बात करती है, वहीं विश्वविद्यालय प्रशासन का सुस्त रवैया शोध की निरंतरता को बाधित कर रहा है। उन्होंने कहा है कि लंबी देरी का प्रतिकूल प्रभाव न केवल विद्यार्थियों के करियर और समय प्रबंधन पर पड़ रहा है, बल्कि निरंतर तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों को भारी मानसिक तनाव और आर्थिक अनिश्चितता का भी सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग की है कि छात्रहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए सत्र 2026 में पी.एच.डी. प्रवेश परीक्षा का शीघ्र, निष्पक्ष एवं पारदर्शी आयोजन सुनिश्चित किया जाए। पत्र के माध्यम से विश्वविद्यालय को सचेत किया है कि यदि इस गंभीर विषय पर संवेदनशीलता के साथ त्वरित और सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया, तो आजाद सेवा संघ छात्रों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा हेतु लोकतांत्रिक और वैधानिक माध्यमों से कड़े कदम उठाने के लिए बाध्य होगा, जिसकी पूर्ण जिम्मेदारी विश्वविद्यालय प्रशासन की होगी।

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