ग्रामीण विक्रेता फुटकर में 800 से 1000 रुपये किलो बेच रहे
अंबिकापुर। पहली बारिश के साथ ही सरगुजा के जंगलों से ‘पुट्टूÓ की आवक शुरू हो गई है, बाजार में इसके दाम सुनकर सबके होश उड़ रहे हैं। इसके बाद भी खाने के शौकीन मिट्टी में सने पुट्टू को खरीदने के लिये छांटते नजर आ रहे हैं। अभी सीजन की शुरुआत है, इसलिए पुट्टू की आवक कम है, और बाजार में इसका भाव 800 से 1000 रुपये प्रति किलो है। जंगल से पुट्टू लेकर आने वाले ग्रामीणों की तो चांदी है, लेकिन इनकी पहुंच शहर तक नहीं हो पा रही है। व्यापारी इनके घरों से ही औने-पौने दामों में पुट्टू खरीदकर मंडी की भांति बोली लगवा रहे हैं। इसके बाद फुटकर विक्रेता एक भाव तय करके पुट्टू की बिक्री कर रहे हैं।
बता दें कि, हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी मानसूनी बारिश की पहली फुहार के बाद थोक में पुट्टू लेकर व्यापारी पहुंचने लगे हैं। शहर के आकाशवाणी चौक के पास स्थित पौनी पसारी बाजार में अलसुबह से ही पुट्टू की बोली लगाने के लिये कोचिये सक्रिय हो जाते हैं। बताया जा रहा है कि गुरूवार को लगी बोली में पुट्टू का भाव 550 रुपये तक पहुंचा। कुछ कोचिये पुट्टू की पूरी बोरी थोक भाव में खरीदने के बाद ग्रामीण महिला-पुरूषों को चिल्हर में बेचने के लिये थमा दिये। यहीं से पुट्टू का भाव बढ़ना शुरू होता है और लगभग डेढ़ से दो गुना अधिक दाम में इसकी बिक्री होने लगती है। गुरूवार को आकाशवाणी चौक में काफी पुट्टू विक्रेता नजर आये। कोई इनके पास से पुट्टू का दाम पूछकर निकल लेता तो कोई मिट्टी से सने पुट्टी को छांटने लगता। भरी बारिश के बीच यहां के बाजार का नजारा ही बदल गया। हरी सब्जियों की जगह बोरियों में पुट्टू लेकर बैठे ग्रामीण महिलाओं और पुरुषों की तादाद ज्यादा देखने को मिल रही थी। हालांकि जंगलों से निकलकर आने वाला यह पुट्टू सब्जी आम आदमी थाली से फिलहाल दूर रहेगा।
ग्रामीणों की आजीविका है साधन
पुट्टू जंगल से मिलने वाला प्राकृतिक उत्पाद हैं, लेकिन इसका स्वाद लेने के लिये लोग लालायित रहते हैं। बरसात के मौसम में सरगुजा के आदिवासी और ग्रामीण जोखिम के बीच पुट्टू के संग्रहण में लग जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में यह उनकी आजीविका का साधन भी है। लम्बे समय से इस कारोबार में लगे व्यापारी ग्रामीणों के संपर्क में रहते हैं, और इनसे औने-पौने दामों में सौदा करके इसे शहर तक ले आते हैं। वाहनों में बोरियों में भरकर मंडी बाजार तक पुट्टू लेकर आने वाले लोगों का महज दो से तीन घंटे में लाखों का कारोबार हो जाता है। ये बात अलग है कि छोटे विक्रेता घंटों ग्राहकों के आने-जाने के बीच देर शाम चौराहे पर बैठकर बिताते हैं।

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