वैश्विक जलवायु और मौसम को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारकों में उष्ण कटिबंधीय प्रशांत महासागर में जन्म लेने वाले दो कारक अक्सर चर्चा में रहते हैं। ये दो कारक हैं ‘अल-नीनोÓ और ‘ला-नीनाÓ। ये दोनों स्पेनिश भाषा के शब्द हैं। अल-नीनो का हिंदी अर्थ छोटा बच्चा या छोटा लड़का है जबकि ला-नीना का अर्थ होता है छोटी बच्ची या छोटी लड़की। माना जाता है कि मौसम के इस कारक का नाम अल-नीनो मछुआरों और समुद्री नाविकों का दिया हुआ है। वास्तव में समुद्री मछुआरे और नाविक अपने लंबे सामुद्रिक अनुभवों से समुद्र की अवस्थाओं में होने वाले बदलाव और आगे उनके प्रभाव की बहुत अच्छी समझ रखते थे। भले ही आधुनिक मौसम विज्ञान की प्रगति से अब इस प्रकार के मौसमी तत्वों का वैज्ञानिक अध्ययन और विश्लेषण होता है परंतु 18वीं-19वीं शताब्दियों के दौरान इन कारकों की व्याख्या अनुभवों पर ही आधारित हुआ करती थी। दक्षिण अमेरिका के पैसेफिक ओसन अर्थात प्रशांत महासागर में विचरण करने वाले मछुआरों ने अनुभव किया कि क्रिसमस के आसपास या उसके बाद समुद्री तापमान में अचानक बदलाव आता है, जिससे एक बड़े समुद्री पिंड में तीव्र तापान्तर उत्पन्न होता है। जब भी समुद्री सतह पर इस प्रकार अनियमित तापान्तर उत्पन्न होता है तब इसका प्रभाव अगले कई महीनों तक वहां के जलवायु को प्रभावित करता है। दिसम्बर में क्रिसमस के आसपास जन्म लेने वाले इस मौसमी कारक को उन लोगों ने ही पहली बार ईसा मसीह के बालक रूप को ध्यान में रखते हुए इसे ‘अल-नीनोÓ अर्थात ‘शिशु क्राइस्टÓ या ‘यीशु का बालकÓ का सम्बोधन प्रदान किया था। वहीं अल-नीनो के विपरीत गुणधर्म वाले कारक को ‘ला-नीनाÓ कहा गया।
पीरू धारा (हम्बोल्ट धारा) अल-नीनो का सहायक
दक्षिण अमेरिका महाद्वीप में स्थित पीरुवीयन सागर के तटीय देश पेरू तथा इक्वाडोर के पश्चिमी हिस्सों में सामान्य अवस्था में दक्षिण से उत्तर की ओर ठंडी सागरीय हवाएं प्रवाहित होती रहती हैं। इन ठंडी समुद्री हवाओं को पीरू धारा या हम्बोल्ट धारा कहा जाता है। कभी-कभी इस क्षेत्र के उष्ण कटिबंधीय प्रशांत महासागर के गर्भ में गुरुत्वीय प्रभाव मानें या भू-गर्भ संचित उष्मा का रिसाव कहें जिसके कारण दिसम्बर के अंत के समय अचानक आंतरिक समुद्री उष्मा के प्रवाहित होने से समुद्री जल के तापमान में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की जाती है। इस समय समुद्री सतही जल का तापमान सामान्य औसत से 5 से 6 डिग्री तक ऊपर चला जाता है। अचानक हुए तापान्तर के कारण यहां के वायुमंडल के गर्म हो जाने से ऊपर उठ कर समुद्री सतह पर निम्न वायुदाब उत्पन्न करती है, जिससे वायु प्रवाह अनियमित होने से हम्बोल्ट धारा एकदम से विपरीत हो जाती है और सामान्य रूप से दक्षिण से उत्तर की ओर चलने वाली हवा अब उत्तर से दक्षिण की ओर चलने लगती है। वायुमंडलीय दशाओं में आए इस परिवर्तन को ही अल-नीनो कहा गया है। अर्थात अल-नीनो की उत्पत्ति समुद्री सतह के तापमान के बढ़ने के कारण उस समुद्री क्षेत्र पर बने गर्म वृहत वायु पिंड के कारण होता है।
ला नीना क्या है?
भूमध्य रेखीय प्रशांत महासागर क्षेत्र के सतह पर निम्न हवा का दबाव होने पर ये स्थिति पैदा होती है। इसकी उत्पत्ति के अलग-अलग कारण माने जाते हैं लेकिन सबसे प्रचलित कारण यह तब पैदा होता है, जब ट्रेड विंड, पूर्व से बहने वाली हवा काफी तेज गति से बहती हैं। इससे समुद्री सतह का तापमान काफी कम हो जाता है। इसका सीधा असर दुनियाभर के तापमान पर होता है और तापमान औसत से अधिक ठंडा हो जाता है।
ला नीना का मौसम पर असर
ला-नीना का चक्रवात पर भी असर होता है। ये अपनी गति के साथ उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की दिशा को बदल सकती है। उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में बहुत अधिक नमी वाली स्थिति उत्पन्न होती है। इससे इंडोनेशिया और आसपास के इलाकों में काफी बारिश हो सकती है। वहीं ईक्वाडोर और पेरू में सूखे जैसे हालात बन जाते हैं, जबकि ऑस्ट्रेलिया में बाढ़ आने के आसार होते हैं। ला-नीना से आमतौर पर उत्तर-पश्चिम में मौसम ठंडा और दक्षिण-पूर्व में मौसम गर्म होता है। भारत में इस दौरान भयंकर ठंड पड़ती है और बारिश भी ठीक-ठाक होती है।
निम्न वायुदाब क्षेत्र 22 नबम्बर को हुआ विकसित
मल्लका जलडमरू मध्य और आसपास के दक्षिण अंडमान सागर क्षेत्र पर एक निम्न वायुदाब क्षेत्र 22 नबम्बर की सुबह विकसित हुआ है जो पश्चिम-उत्तर पश्चिम दिशा में अग्रसर है। संभावना है कि यह आगे बढ़ते हुए निम्न वायुदाब क्षेत्र पूर्वी बंगाल की खाड़ी में पहुंच कर में आगामी 24 नबम्बर तक एक अवदाब के रूप में विकसित हो जाएगा। 26 तारीख के आसपास यह तीव्र होकर दक्षिण-पश्चिम बंगाल की खाड़ी में भारतीय भू-भाग के नजदीक पहुंच जाएगा। फिलहाल इस मौसम प्रणाली से तमिलनाडु और कर्नाटक में व्यापक वर्षा का अनुमान है।
मौसम एजेंसियों के अलग-अलग दावे
इधर ला-नीना को लेकर दो राय सामने आ रही है, अमेरिकी मौसम एजेंसी और भारतीय मौसम विभाग के अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं। अमेरिकी मौसम एजेंसी सीपीसी के अनुसार ला नीना शुरू हो चुका है जबकि आईएमडी सहित आस्ट्रेलिया की बीओएम और मध्य एशिया पैसेफिक की एपीसीसी जैसी मौसम एजेंसियां कह रही हैं कि ला नीना अभी प्रभावी नहीं हुआ है, लेकिन जल्द आएगा। आईएमडी का कहना है कि अभी एल नीनो का दक्षिणी दोलन फेज की स्थिति न्यूट्रल बनी हुई है और ला नीना आने वाले महीनों में विकसित होगा। ला नीना का सीधा असर बारिश, सर्दियों, चक्रवातों और वैश्विक मौसम पैटर्न पर पड़ता है। अनुमान है कि ला-नीना दिसंबर 2025 के आसपास शुरू होगा और मार्च 2026 तक खत्म हो जाएगा।  
भारत के लिए ला नीना के मायने
भारत में इस समय उत्तर-पूर्व मानसून सक्रिय है, जो तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और दक्षिणी कर्नाटक के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। आईएमडी का संकेत है कि निगेटिव आईओडी के साथ विकसित होता ला-नीना, दोनों मिलकर दक्षिण भारत में बारिश बढ़ा सकते हैं। इसलिए तमिलनाडु और दक्षिणी प्रायद्वीप में नवंबर-दिसंबर के दौरान बारिश पर इसका असर दिख सकता है। ताजा रिपोर्टों में पता चला है कि मध्य और पूर्वी प्रशांत में तापमान तेजी से नीचे जा रहा है। पश्चिमी प्रशांत भी धीरे-धीरे ठंडा हो रहा है। इंडोनेशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में बादल और बारिश बढ़ी है। डेटलाइन के आस-पास बारिश कम हुई है और इन संकेतों से पता चलता है कि ला-नीना काफी करीब है। आईएमडी ने बताया कि इस समय मैडेन जूलियन दोलन (एमजेओ) फेज 6 में है और जल्द ही फेज 7 में जाएगा। यह बदलाव अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और दक्षिण भारत की बारिश पर बड़ा असर डाल सकता है।

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