5 एकड़ जमीन पर शुुरु हुआ था प्रोजेक्ट, फायदे में से हिस्सा देने का दिया गया था भरोसा

अंबिकापुर। छत्तीसगढ़ के शिमला नाम से विख्यात मैनपाट में पायलट प्रोजेक्ट के तहत अब चाय की खेती नहीं हो रही है। जो बचे-खुचे पौधे हैं, उन्हें मवेशी चर रहे हैं। वर्ष 2019 में ग्राम ललेया के 3 किसानों की 5 एकड़ जमीन का चयन चाय बागान के लिए किया गया था। किसानों को भरोसा दिलाया गया था कि चाय की बिक्री में से लाभ का एक हिस्सा उन्हें भी दिया जाएगा, लेकिन 6 साल बाद भी उन्हें एक चवन्नी नसीब नहीं हुई है। ऐसे में किसान खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं।
जशपुर जिले में चाय की खेती में अपार सफलता मिल चुकी है। मैनपाट की जलवायु भी जशपुर की ही तरह होने की वजह से इसे भी चाय की खेती के अनुकूल माना गया। वर्ष 2019 में मैनपाट के ग्राम ललेया में वन विभाग द्वारा पायलट प्रोजेक्ट के तहत 3 किसानों की सहमति से उनकी 5 एकड़ जमीन ली गई। इसके लिए जशपुर से 1 हजार पौधे भी मंगाए गए थे। उक्त जमीन पर पौधे तो लगाए गए, लेकिन चाय की खेती उस अनुरूप नहीं हो पाई, जिसकी उम्मीद लगाई गई थी।
एक रुपया भी नहीं मिला, जमीन भी फंसी
वन विभाग के अफसरों द्वारा किसानों को यह आश्वासन दिया गया था कि चाय की बिक्री के बाद उन्हें भी इसका हिस्सा मिलेगा, लेकिन 6 साल बाद उन्हें फूटी कौड़ी भी नसीब नहीं हुई। ऊपर से उनकी जमीन भी फंस गई है। वे अपनी जमीन पर आलू, टाऊ समेत अन्य दूसरी फसल लगाने वन व राजस्व विभाग के चक्कर लगा रहे हैं।
मवेशी चर गए बचे-खुचे पौधे
वन विभाग द्वारा किसानों की जिस जमीन पर लाखों रुपये खर्च कर चाय के पौधे लगाए गए थे, वे कुछ दिनों तक तो लहलहाते रहे, लेकिन उदासीनता की वजह से फसल का उत्पादन नहीं हो सका। अब उनकी देख-रेख भी नहीं हो रही है। विंडबना यह है कि बचे-खुचे चाय के पौधों को मवेशी चर रहे हैं और कोई ध्यान देने वाला भी नहीं है।
4 साल में तैयार होती है चाय की फसल
बीज बोने के बाद करीब 4 से 12 साल में चाय का पौधा फल देने लगता है, जबकि एक साल में चाय की पत्तियों की तुड़ाई होने लगती है। इसके अलावा कलम से उगाए गए पौधे को कटाई के लिए तैयार होने में करीब 3 साल का समय लगता है। किसान एक साल में 3 बार पत्तियों की तुड़ाई कर सकते हैं।

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