अंबिकापुर। चैत्र मास देवी उपासना का पवित्र महीना है। चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से लेकर  नवमी तक देवी पूजा की धूम रहती है। इस अवसर पर देवी के विभिन्न रूपों में पूजा सभी देवी मंदिरों में धूमधाम से की जाती है। सरगुजा के जनजातीय समुदाय के लोग भी मां भगवती की पूजा पारंपरिक ढंग से विभिन्न नामों से धूमधाम से करते हैं। आश्विन नवरात्रि मां दुर्गा पूजा और चैत्र नवरात्रि रामनवमी पूजा के लिए प्रसिद्ध है। सरगुजा अंचल में विभिन्न तीज, त्यौहार पर्व, संस्कारों और सभी पावन अवसरों पर पारंपरिक लोकगीतों का गायन किया जाता है। चाहे वह पावन अवसर देवी पूजा ही क्यों ना हो। और चारों तरफ देवी सेवा गीत और जस गीत की धुन सुनाई देती है। सरगुजांचल में देवी भक्त शारदीय और चैत्र दोनों में मां भगवती की उपासना कहीं ज्वालामुखी देवी, कहीं मां महामाया, कहीं कुदरगढ़ी देवी, कहीं खुड़िया रानी, कहीं रमपुरहिन दाई, कहीं गढ़वतिया देवी तो कहीं बड़की माई के नाम से पूजते हैं। श्रद्धालु भक्त नौ दिनों तक माता के नौ रूपों की पूजा और सेवा पारंपरिक सरगुजिहा लोक गीतों के साथ सच्चे मन से करते हैं, और मन चाहा वरदान पाते हैं। चैत्र रामनवमी के अवसर पर जवारा बुन कर नौ दिनों तक देवी सेवा गीतों का गायन किया जाता है। ग्रामीण देवी का रूप धारण कर जवारा निकालते हैं। जिस व्यक्ति पर देवी सवार रहती है, वह अपने शरीर के विभिन्न अंगों में त्रिशूल का बाना धारण कर खप्पर पकड़ता है। किंदरा, डमफा, डोल जैसे विभिन्न पाारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ सेवा गीत गाते हुए घर-घर दर्शन देकर, देवी रोग, कष्ट दूर करने का आशीर्वाद देती हैं।
चलगली के मां महामाया मंदिर में खडग और नगाड़े की होती है पूजा
मां महामाया सरगुजा संभाग मुख्यालय अंबिकापुर से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर चलगली महामाया मंदिर में राज परिवार की कुलदेवी और आदिवासी अंचल की आराघ्य देवी के रूप में पूजित हैं। यहां प्रत्येक वर्ष क्वांर नवरात्रि के अवसर पर पंचमी तिथि को शंकरगढ़ राजपरिवार के वर्तमान उत्तराधिकारी के द्वारा विशेष पूजा की जाती है। शंकरगढ़ राजपरिवार के वर्तमान उत्तराधिकारी अनुराग सिंह देव ने बताया कि यहां की महामाया हमारी कुलदेवी के रूप में पूजित हैं। इसलिए प्रत्येक क्वांर नवरात्रि की पंचमी को हमारे परिवार के द्वारा विशेष पूजा और नौ कन्याओं को भोज कराया जाता है। प्राय: देखा जाता है कि देवी मंदिरों में किसी मूर्ति या प्रतिमा की पूजा होती है। किंतु चलगली के महामाया मंदिर में केवल मां के खडग और नगाड़े की पूजा होती है। इस संबंध में मान्यता प्रचलित है कि देवी मां का स्वरूप नगाड़े में विराजमान है, इसलिए नगाड़े और मां की खडग की विशेष पूजा होती है।
केन्द्रीय विवि बिलासपुर की पुस्तक में कुदरगढ़ी देवी की गौरव गाथा शामिल
सरगुजा अंचल की प्रसिद्ध देवी कुदरगढ़ी माता हैं। सूरजपुर जिला अन्तर्गत ओड़गी ब्लाक मुख्यालय से लगभग छह किलोमीटर की दूरी पर उत्तर पश्चिम में कुदरगढ़ पर्वत के सघन वनों के बीच शक्तिपीठ मां बागेश्वरी बाल रूप में कुदरगढ़ी देवी के नाम से विराजमान हैं। दोनों नवरात्रि में यहां नौ दिनों तक श्रद्धालु भक्तों का तांता लगा रहता है। शक्तिपीठ मां बागेश्वरी कुदरगढ़ी देवी के संबंध में एक जनश्रुति प्रचलित है कि वनवास काल में भगवान श्री राम, लक्ष्मण और माता सीता ने भी इस पर्वत पर मां वन देवी की पूजा अर्चना की थी। साहित्यकार अजय कुमार चतुर्वेदी ने शक्तिपीठ मां कुदरगढ़ी देवी की गौरव गाथा लिखी है, जो शक्तिपीठ पुस्तक में प्रकाशित है। इस पुस्तक के संपादक प्रोफेसर आलोक कुमार चक्रवाल, कुलपति केन्द्रीय विश्वविद्यालय बिलासपुर हैं।
सरगुजा अंचल की आराध्य देवी जगत जननी मां महामाया
सरगुजांचल की आराध्य देवी अंबिकापुर की जगत जननी मां महामाया हंै, जो शक्तिपीठ के रूप में विराजमान हैं। यहां कुछ दूरी पर मां समलेश्वरी विराजमान हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां से कोई भी श्रद्धालु भक्त खाली हाथ नहीं लौटता है। कालांतर में मां महामाया अंबिका देवी के नाम से श्रीगढ़ की पहाड़ी पर पूजित थीं। यहां चैत्र नवरात्र में श्रद्वालु भक्तों का अपार जन सैलाब उमड़ता है। ब्रिटिश शासन काल में 16 अक्टूबर सन् 1905 ई. के बंगाल विभाजन के पहले तक सरगुजा बंगाल के छोटा नागपुर कमिश्नरी में शामिल था। यह छत्तीसगढ़ कमिश्नरी के 14 रियासतों में दूसरे नंबर का रियासत था। रियासत काल में सरगुजा की राजधानी प्रतापपुर को बनाई गई थी, जो महाराजा रघुनाथशरण सिंहदेव बहादुर के समय सरगुजा की राजधानी प्रतापपुर से वर्तमान अंबिकापुर लाई गई। उस समय अंबिकापुर को बिश्रामपुर कहा जाता था। 16 अक्टूबर 1905 ई. को सरगुजा के मध्य प्रांत के प्रशासन के अधीन होने तक विश्रामपुर कहा जाता था। छत्तीसगढ़ नए सूबा में सरगुजा के शामिल होने के साथ ही विश्रामपुर का नाम अंबिकापुर, अंबिका देवी के नाम पर रखा गया। मान्यता है कि मां के दरबार से कोई भक्त खाली हाथ नहीं लौटता। माता प्रतापपुर विकासखंड के रमकोला में ज्वालामुखी देवी के नाम से, लखनपुर के जजगा गांव में रमपुरहिन दाई के नाम से और जसपुर जिले में खुड़िया रानी के नाम से देवी पूजा होती है।
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राज्यपाल से सम्मानित साहित्यकार ने किया शो
राज्यपाल से पदुम लाल पुन्ना लाल बख्सी स्मृति पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार अजय कुमार चतुर्वेदी ने सरगुजा अंचल के देवी स्थलों पर ग्रामीणों, पुजारी, बैगा, और स्थानीय लोगों से जानकारी लेकर शोध कार्य किया है। उन्होंने बताया कि सरगुजांचल में विभिन्न नामों से देवी की पूजा-अर्चना की जाती है। अंबिकापुर में सरगुजा राज परिवार की कुल देवी और सरगुजा अंचल की आराध्य देवी जगत जननी मां महामाया के नाम से, सूरजपुर जिले के देवीपुर में महामाया और ओड़गी तहसील के कुदरगढ़ में कुदरगढ़ी देवी और महोली गांव में गढ़वतिया देवी के नाम से पूजा होती है। प्रेमनगर विकासखण्ड के पंपापुर में महामाया और मंदिरों की नगरी प्रतापपुर में मां समलेश्वरी, मां महामाया और मां काली की पूजा होती है। रमकोला में ज्वालामुखी देवी नाम से देवी की पूजा-अर्चना होती है। शंकरगढ़ चलगली के महामाया मंदिर में ‘बड़की माईÓ के नाम से पूजी जाती देवी हैं। मान्यता है कि यहां देवी मां का स्वरूप नगाड़े में विराजमान है, इसलिए मंदिर का पुजारी (बैगा) मां के खडग और नगाड़े की पूजा विधि-विधान से राजपरिवार के तत्कालीन उत्तराधिकारी से करावाता है।

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