वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. संदीप शर्मा ने किसानों को वैज्ञानिक तकनीक अपनाने दी सलाह

अंबिकापुर। खरीफ मौसम में धान की फसल से अधिक एवं गुणवत्तापूर्ण उत्पादन प्राप्त करने के लिए समय पर खरपतवार प्रबंधन अपनाना अत्यंत आवश्यक है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के कुलपति एवं निदेशक विस्तार के मार्गदर्शन में कृषि विज्ञान केन्द्र, सरगुजा द्वारा किसानों को धान की फसल में वैज्ञानिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के उपायों की जानकारी दी जा रही है। कृषि विज्ञान केन्द्र, सरगुजा के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. संदीप शर्मा ने बताया कि छत्तीसगढ़ धान का कटोरा होने के साथ-साथ सरगुजा जिले में भी धान का व्यापक रकबा है। ऐसे में धान की अधिक उत्पादकता सुनिश्चित करने के लिए खरपतवारों का समय पर एवं वैज्ञानिक प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है।
वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. शर्मा ने बताया कि धान की फसल में उगने वाले खरपतवार जल, पोषक तत्व, प्रकाश एवं स्थान के लिए मुख्य फसल के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं। इसके कारण फसल की बढ़वार प्रभावित होती है तथा उत्पादन में 15 से 80 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। उन्होंने कहा कि रोपाई के बाद 20 से 45 दिनों की अवधि खरपतवार नियंत्रण की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण होती है। यदि इस अवधि में खरपतवारों का प्रभावी नियंत्रण कर लिया जाए तो धान की फसल स्वस्थ रहती है तथा उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। धान के खेतों में मुख्य रूप से घास, चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार तथा नटसेज/मोथा वर्ग के खरपतवार पाए जाते हैं। इनकी प्रकृति अलग-अलग होने के कारण इनके नियंत्रण के लिए भी वैज्ञानिक एवं संयुक्त प्रबंधन अपनाना आवश्यक है।
सस्य क्रियाएं एवं यांत्रिक उपायों को दें प्राथमिकता
खरपतवार नियंत्रण के लिए सबसे पहले सस्य क्रियाएं अपनाए जाने चाहिए। इसके अंतर्गत खेत की अच्छी तैयारी, गहरी जुताई एवं पलेवा करने से खरपतवारों के बीज नष्ट हो जाते हैं। उचित बीज दर एवं निर्धारित कतार दूरी रखने से फसल सघन होती है, जिससे खरपतवारों की वृद्धि स्वत: कम होती है। इसके अलावा फसल चक्र अपनाने एवं समय पर रोपाई करने से भी खरपतवारों का प्रकोप कम होता है। डॉ. शर्मा ने बताया कि यांत्रिक विधियों के अंतर्गत रोपाई के 20 से 25 दिन एवं 40 से 45 दिन के बीच हाथ से निराई-गुड़ाई करना अत्यंत लाभकारी होता है। आवश्यकता अनुसार कोनोवीडर का उपयोग भी धान के खेतों में खरपतवार नियंत्रण का प्रभावी एवं कम लागत वाला विकल्प है।
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खरपतवारनाशियों का प्रयोग फसल की अवस्था अनुसार करें
वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. शर्मा ने बताया कि आवश्यकता पड़ने पर अनुशंसित खरपतवारनाशियों का उपयोग फसल की अवस्था एवं खरपतवार की प्रकृति के अनुसार निर्धारित मात्रा में ही किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि रोपा धान में अंकुरण पूर्व खरपतवार नियंत्रण के लिए पायरेजो सल्फ्युरौन 10 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. (साथी) का 80 ग्राम प्रति एकड़ की दर से रोपाई के 0 से 3 दिनों के भीतर तथा प्रीटिलाक्लोर 50 प्रतिशत ई.सी. (रिफिट) का 600 ग्राम प्रति एकड़ की दर से 3 से 6 दिनों के भीतर उपयोग करना लाभकारी होता है। इसी प्रकार बोता धान में अंकुरण पश्चात बिसपायरीबैक सोडियम 10 प्रतिशत एस.सी. (नोमिनी गोल्ड) का 100 ग्राम प्रति एकड़ की दर से 20 से 25 दिनों के भीतर प्रयोग करने की सलाह दी गई है। रोपा धान में अंकुरण पश्चात खरपतवार नियंत्रण के लिए फिनाक्साप्रॉप+इथाक्सीसल्फ्युरौन 15 प्रतिशत डब्ल्यू.डी.जी. का 290 ग्राम प्रति एकड़, बिसपायरीबैक सोडियम 10 प्रतिशत एस.सी. का 100 ग्राम प्रति एकड़ तथा पिनोक्सुलम 21.7 प्रतिशत एस.सी. (ग्रेनाइट) का 42 ग्राम प्रति एकड़ निर्धारित समय पर उपयोग करने से घास कुल, चैड़ी पत्ती वाले एवं मोथा वर्ग के खरपतवारों का प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है।
वैज्ञानिक सलाह अपनाकर बढ़ाएं उत्पादन
कृषि विज्ञान केन्द्र, सरगुजा के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. संदीप शर्मा ने जिले के किसानों से अपील की है वे कृषि वैज्ञानिकों की अनुशंसाओं का पालन करते हुए समय पर एकीकृत खरपतवार प्रबंधन अपनाएं। इससे धान की फसल को खरपतवारों से होने वाले नुकसान से बचाया जा सकेगा, उत्पादन लागत में कमी आएगी, गुणवत्तापूर्ण उपज प्राप्त होगी तथा किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि सुनिश्चित हो सकेगी।

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