महामना मालवीय मिशन सरगुजा द्वारा आध्यात्मिक संगोष्ठी एवं गीता पाठ का आयोजन

अंबिकापुर। महामना मालवीय मिशन सरगुजा के तत्वावधान में नगर की साहित्यकार डॉ. पुष्पा सिंह के निवास पर आध्यात्मिक संगोष्ठी एवं श्रीमद्भगवत गीता के दशम अध्याय विभूति योग का सामूहिक पाठ आयोजित किया गया। संगोष्ठी में नगर के विद्वानों, प्रबुद्ध नागरिकों एवं गीता प्रेमियों ने सहभागिता कर विभूति योग के आध्यात्मिक, दार्शनिक एवं व्यावहारिक पक्षों पर विचार व्यक्त किए।
वक्ताओं ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता का दसवां अध्याय भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन करते हुए बताते हैं कि सृष्टि का प्रत्येक श्रेष्ठ, सुंदर, तेजस्वी और कल्याणकारी स्वरूप उसी परम चेतना की अभिव्यक्ति है। यह अध्याय मनुष्य को ऐसी दृष्टि प्रदान करता है जिससे वह संपूर्ण सृष्टि में ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव कर सके। अवकाश प्राप्त पुलिस अधीक्षक ललित मोहन तिवारी ने कहा कि विभूति योग का मूल संदेश है कि, ईश्वर किसी एक स्थान, रूप अथवा प्रतीक तक सीमित नहीं हैं। वे समस्त सृष्टि के मूल कारण, आधार और संचालक हैं। जहां कहीं भी शक्ति, ज्ञान, सौंदर्य, करुणा और तेज दिखाई देता है, वह उसी परम सत्ता के दिव्य तेज का अंश है। राम नारायण शर्मा ने कहा कि विभूति योग मनुष्य को यह बोध कराता है कि संपूर्ण ब्रह्मांड का संचालन एक ही परम चेतना द्वारा हो रहा है। इस सत्य का बोध मनुष्य के मोह, भ्रम और संशय को समाप्त कर आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है। ब्रह्मशंकर सिंह ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने विभूति योग में पर्वतों में हिमालय, नदियों में गंगा, वृक्षों में अश्वत्थ, ऋषियों में नारद, योद्धाओं में श्रीराम तथा ज्ञानियों में वेदव्यास को अपनी विशेष विभूतियां बताया है। इससे स्पष्ट होता है कि संसार की प्रत्येक श्रेष्ठता परमात्मा की महिमा का ही एक अंश है। डॉ. वी.के. सिंह ने कहा कि जब मनुष्य प्रत्येक श्रेष्ठता में ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करने लगता है, तब उसके भीतर अहंकार के स्थान पर विनम्रता, श्रद्धा और संवेदनशीलता का विकास होता है। कार्यक्रम की आयोजिका डॉ. पुष्पा सिंह ने कहा कि विभूति योग का महत्वपूर्ण उद्देश्य भक्ति और ज्ञान का समन्वय स्थापित करना है। सुनील दत्त पाण्डेय ने कहा कि ज्ञान सत्य का बोध कराता है, जबकि भक्ति उसे आत्मीय रूप से जोड़ती है। दोनों का संतुलन ही जीवन को पूर्णता प्रदान करता है। जय प्रकाश चैबे ने कहा कि बुद्धि, ज्ञान, क्षमा, सत्य, संयम, दान, धैर्य जैसे मानवीय गुण भी उसी परम सत्ता से उत्पन्न होते हैं। देवेन्द्र नाथ दुबे ने कहा कि ईश्वर की अनुभूति दृष्टिकोण के परिवर्तन से संभव होती है। रणविजय सिंह तोमर ने कहा कि वर्तमान भौतिकवादी युग में विभूति योग का संदेश अत्यंत प्रासंगिक है। कार्यक्रम का संचालन राज नारायण द्विवेदीÓ ने किया। उन्होंने कहा कि गीता का यह अध्याय श्रद्धा, समरसता, पर्यावरण चेतना और आध्यात्मिक जीवन-दृष्टि का अद्वितीय संदेश देता है। संगोष्ठी में डॉ. जी.डी. अग्रवाल, हरिशंकर सिंह, मदनमोहन मेहता, प्रकाश कश्यप, अशोक सोनकर, सच्चिदानंद पाण्डेय सहित मिशन के अन्य सदस्य उपस्थित रहे। समापन सामूहिक प्रार्थना एवं प्रसाद वितरण के साथ हुआ।

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