0 दवनकरा समिति पर किसानों का आरोप, हर साल कटती रकम, फिर भी बढ़ता बकाया

सूरजपुर। जिले के प्रतापपुर क्षेत्र की आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्या. दवनकरा अब किसानों के लिए सहारा नहीं, बल्कि संकट का कारण बनती जा रही है। ग्राम पंचायत मटिगढ़ा और आसपास के गांवों के किसानों ने कलेक्टर को लिखित शिकायत सौंपते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं कि समिति प्रबंधन द्वारा बिना ऋण लिए ही उनके नाम पर फर्जी कर्ज चढ़ाकर जबरन वसूली की जा रही है। यह मामला अब केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि संगठित आर्थिक शोषण की तस्वीर पेश कर रहा है।।किसानों के अनुसार, वे हर वर्ष समिति से खाद लेते हैं और उसका भुगतान धान बिक्री के समय स्वचालित रूप से काट लिया जाता है। इसके बावजूद, अगले वर्ष फिर से “पुराना बकाया” दिखाकर उनसे रकम मांगी जाती है। कई किसानों ने बताया कि उन्हें स्पष्ट हिसाब किताब नहीं दिया जाता, न ही यह बताया जाता है कि कर्ज आखिर कब और कैसे बढ़ गया। परिणामस्वरूप, वे हर साल एक ही चक्र में फंसते जा रहे हैं।कटौती भी हो रही है और बकाया भी बढ़ रहा है। इस पूरे मामले में समिति प्रबंधक और कम्प्यूटर ऑपरेटर की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं। किसानों का आरोप है कि दोनों मिलकर खातों में हेरफेर कर रहे हैं और कर्ज की राशि को मनमाने तरीके से बढ़ा रहे हैं। जिन किसानों ने कभी ऋण लिया ही नहीं, उनके नाम पर भी हजारों रुपये का बकाया दिखाया जा रहा है। कई मामलों में यह राशि 40 से 50 हजार रुपये तक पहुंच चुकी है, जो छोटे और सीमांत किसानों के लिए भारी बोझ बन गई है।

शिकायत में जिन किसानों के नाम शामिल हैं, वे इस कथित घोटाले की गंभीरता को उजागर करते हैं। झोला, बैजनाथ, अनभुल, धाना, अमीर साय, बिगनी, निरंजन, देवसाय, मदन, मुन्ना, करमातो, जयराम, अनुक साय, धनीराम, रनसाय, बंधन, सोभित, मड़वारी, तुलसी, टोपन, छब्बेलाल और सोहर साय जैसे कई किसानों के नाम के साथ हजारों रुपये का कथित कर्ज दर्शाया गया है। कई किसानों का कहना है कि वे इस कर्ज के बोझ से मानसिक रूप से परेशान हो चुके हैं और उनकी आर्थिक स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। 30 अप्रैल को जिला प्रशासन की एक टीम दवनकरा समिति में जांच के लिए पहुंची थी, लेकिन इस जांच ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। किसानों का आरोप है कि जांच प्रक्रिया पूरी तरह पक्षपातपूर्ण रही और उनके शिकायत बिंदुओं को नजरअंदाज किया गया। कई किसानों ने बताया कि उनसे न तो विस्तृत बयान लिया गया और न ही उनके दस्तावेजों की सही तरीके से जांच की गई। उल्टा, समिति प्रबंधन को बचाने की कोशिश स्पष्ट रूप से नजर आई। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि यह कोई नया मामला नहीं है। समिति प्रबंधक लंबे समय से विवादों में घिरा रहा है और पूर्व में भी कई बार शिकायतें की जा चुकी हैं। जांच में अनियमितताएं सामने आने के बावजूद आज तक किसी प्रकार की ठोस कार्रवाई नहीं हुई। किसानों का आरोप है कि हर बार मामला सुविधा शुल्क के बाद दबा दिया जाता है। सांसद, विधायक, कलेक्टर, एसडीएम और थाना स्तर तक शिकायत पहुंचने के बावजूद परिणाम शून्य रहा है, जिससे किसानों का भरोसा प्रशासन से उठता जा रहा है। यह मामला केवल कागजी गड़बड़ी का नहीं, बल्कि किसानों की आजीविका से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। खेती पर निर्भर इन परिवारों के लिए हर रुपये की अहमियत होती है, और जब उन पर बिना कारण कर्ज का बोझ डाला जाता है, तो उनका जीवन संकट में पड़ जाता है। कई किसानों ने बताया कि इस फर्जी कर्ज के कारण उन्हें साहूकारों से उधार लेना पड़ रहा है, जिससे वे दोहरी मार झेल रहे हैं।  किसानों ने कलेक्टर से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, सभी खातों का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए और जिन अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध है, उनके खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाए। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द न्याय नहीं मिला, तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे। उनका कहना है कि अब वे चुप बैठने वाले नहीं हैं और अपने हक के लिए हर स्तर पर लड़ाई लड़ेंगे। सहकारी समितियां किसानों के सहयोग और आर्थिक मजबूती के लिए बनाई जाती हैं, लेकिन जब वही संस्थाएं शोषण का जरिया बन जाएं, तो यह पूरे सिस्टम पर सवाल खड़ा करता है। 

Spread the love