निजी स्कूलों में बाल संरक्षण आयोग के निर्देशों का पालन नहीं, बच्चों के अधिकारों का हो रहा हनन-शिल्पा
अंबिकापुर। निजी स्कूलों में जहां एक ओर बस्ते का बोझ बच्चों के लिए स्वास्थ्यगत समस्याएं आड़े ला रहा है, वहीं मासूम बच्चों को शौचालय जाने और पानी पीने से रोकना यूटीआई इंफेक्शन की स्थिति निर्मित कर सकता है। भारी-भरकम फीस वसूलने वाले स्कूलों में ऐसी स्थितियों का सामना बच्चों को करना पड़ता है, जिन्हें वास्तव में स्कूल में रहते समय किसी के सहारे की जरूरत रहती है। टायलेट जाने की स्थिति न बने, इसलिए कई बच्चे पानी भरा बोतल और लंच बाक्स लेकर घर वापस लौटते हैं। अगर कोई अभिभावक इस पर स्कूल प्रबंधन के समक्ष आपत्ति करे तो उन्हें बच्चों को शौचक्रिया में कंट्रोल करने के लिए सिखाने की नसीहत देते हंै। इससे होने वाले शारीरिक नुकसान की बात करनेे पर मेडिकल रिपोर्ट लेकर आने कहा जाता है। धन्य हैं, ऐसे स्कूल के संचालक और प्रबंधन जो मासूम बच्चों के मानवाधिकारों का हनन करने जैसी हिमाकत कर रहे हैं, इन्हें बाल संरक्षण आयोग के निर्देशों की परवाह नहीं है।
ऐसा ही कुछ आरोप पेशे से अधिवक्ता एवं समाजसेविका शिल्पा पांडेय ने सरगुजा प्रेस क्लब में पत्रकारों से चर्चा के दौरान लगाया। इनका कहना है कि उनके पास विभिन्न विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों के माध्यम से शिकायत मिली है कि छोटे बच्चों को कक्षा के दौरान शौचालय नहीं जाने दिया जाता है, साथ ही पानी का बॉटल दूर रखवा दिया जाता है, जिससे बच्चा बार-बार पानी ना पी सके। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि बच्चा शौचालय न जाने पाए। कई बच्चे इन स्कूलों में मनमाफिक बनाए गए अनुशासन के नाम पर प्रताड़ित होते हैं। बच्चे को अभिभावक लेने जाएं तो पता चलता है कि जिस स्कूल में हजारों रुपये फीस देकर वे अपने मासूम बच्चे को पढ़ने के लिए भेज रहे हैं, वहां से बच्चा गणवेश में शौच क्रिया के साथ घर पहुंच रहा है। शिल्पा ने कहा कि ऐसे हालात पर गंभीरतापूर्वक विचार करते हुए उन्होंने राज्य बाल संरक्षण आयोग रायपुर की अध्यक्षा डॉ. वर्णिका शर्मा से एक सितम्बर को मुलाकात करके उन्हें पत्र के माध्यम से 11 बिंदुओं पर ध्यानाकर्षण कराया था और बच्चों के मानवाधिकार को ध्यान में रखते हुए तत्संबंध में स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने का आग्रह किया। इसे आयोग ने त्वरित संज्ञान में लिया और 9 सितम्बर को पत्र लिखकर बाल संरक्षण जैसे संवेदनशील विषय पर 10 बिंदुओं में त्वरित कार्रवाई करने के दिशा-निर्देश दिए थे, इसकी प्रतिलिपि सभी जिला कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, जिला शिक्षा अधिकारी को प्रेषित की गई थी। 30 सितम्बर तक सरगुजा जिले में बाल संरक्षण से संबंधित कोई निर्देश जारी नहीं होने पर उन्होंने पुन: कलेक्टर सरगुजा से बाल संरक्षण संबंधित संवेदनशील विषयों पर आयोग द्वारा जारी अनुशंसा के परिपालन में कठोर दिशा-निर्देश जारी कर बच्चों के भविष्य को संरक्षित करने व मॉनीटरिंग कमेटी गठन करने का आग्रह वर्तमान कलेक्टर से किया। इसके बाद कलेक्टर के निर्देश पर जिला शिक्षा अधिकारी सरगुजा ने बाल संरक्षण आयोग से संबंधित विभिन्न विषयों पर आवश्यक कार्रवाई कर स्पष्ट दिशा-निर्देश देते हुए पत्र सर्व प्राचार्य, प्रधान पाठक को प्रेषित किया गया, लेकिन मॉनीटरिंग कमेटी गठन के संबंध में निर्देशित नहीं किया गया। मॉनीटरिंग कमेटी का अभाव में जमीनी स्तर पर दिशा-निर्देशों का कितना पालन हो रहा है, इस पर पर्दा पड़ा हुआ है।
20 किलो का बच्चा 12 किलो का बैग ढो रहा
शिल्पा पांडेय ने कहा कि निजी स्कूलों में पहली से तीसरी तक के बच्चों के लिए बैगलेस डे का प्रावधान नहीं है। 20 किलो का बच्चा पीठ में 12 किलो का बैग ढोकर स्कूल के लिए निकलता है। पानी का बोतल और टीफिन ले जाने से बच्चा इन्कार कर देगा, लेकिन पनिसमेंट के भय से कहता है कि पूरा कॉपी-किताब बैग में रख देना। बस्ते के बोझ को लेकर स्कूल प्रबंधन से बात करने पर शिक्षित अभिभावकों के सामने इनकी दलील रहती है कि इससे पीठ मजबूत होगा। मजबूरी में मासूम बच्चे के बस्ते का बोझ ढोकर अभिभावक इन्हें स्कूल तक पहुंचाते हैं, या स्कूल बसों से रवाना करते हैं। आरोप है कि कम पढ़े-लिखे अभिभावकों के सामने क्लास टीचर इंग्लिस में अपनी बातें कहकर उन्हें मेंटली ह्रासमेंट का शिकार बनाते हैं।
टायलेट जाने के भय से खाना नहीं खा रहे
अधिवक्ता एवं समाजसेविका शिल्पा पांडेय का आरोप है कि घर से बच्चों को अभिभावक टीफिन और बॉटल में पानी देकर भेजते हैं, ताकि उनका बच्चा भूखा-प्यासा न रहे। इधर टायलेट न जाना पड़े इस भय से बच्चे पानी और टीफिन से दूरी बनाए रहते हैं। बच्चों के बस्ते का बोझ कम करने के लिए बाल संरक्षण आयोग को दिए गए पत्र में उन्होंने राष्ट्रीय बैग नीति का जिक्र किया था, जिसमें किस क्लास के बच्चों का स्कूल बैग कितना भारी होगा, इसके लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश है, किन्तु निजी स्कूलों में जिस सिलेबस से पढ़ाई कराई जा रही है, वह बच्चों के कमर का बोझ बन चुकी है, इसका स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ रहा है। सरकारी स्कूलों की तरह बैगलेस डे से इन्हें कोई लेना-देना नहीं है। निजी विद्यालयों में सरकार के नियमों की खुले आम अवहेलना को रोकने के लिए मॉनीटरिंग कमेटी का गठन जरूरी है, ताकि सामान्य अभिभावक किसी प्रकार के दबाव में न रहें। अभिभावकों में भय इस बात का भी रहता है कि यदि स्कूल प्रबंधन के विरूद्ध आवाज उठाने पर इसका परिणाम बच्चों को न भुगतान पड़े।

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