आदिवासी बहुल क्षेत्र में अपना अस्तित्व बचाने कर रहे संघर्ष

बलरामपुर। आदिवासी बहुल क्षेत्र में आदिवासी समाज खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहा है, खासकर पहाड़ी कोरवा जनजाति, जिन्हें राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र के रूप में पहचान मिली है। इनके सामने आज भी अपने ही अस्तित्व को बचाने की चुनौती खड़ी है। पीढ़ियों से अपनी जमीन पर जीवन यापन करने वाले इन लोगों की जमीनें बाहरी लोगों द्वारा लगातार हड़पी जा रही हैं, अवैध अतिक्रमण और जबरन कब्जे की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही है। चार पीढ़ियों से जिन जमीनों पर पहाड़ी कोरवा परिवारों ने मेहनत कर अपना घर बसाया, अपने बच्चों का पालन पोषण और शिक्षा-दीक्षा का आधार बनाया, आज वही जमीन उनसे छीनी जा रही है
दु:ख की बात यह है कि कई मामलों में जमीन विवाद कोर्ट में वर्षों से लंबित हैं, लेकिन न्याय की प्रक्रिया इतनी धीमी है कि पीड़ितों को राहत नहीं मिल पा रही है। बलरामपुर से महज 10 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत तरकाखाड़ में हालात बेहद चिंताजनक हैं, जहां खुलेआम  पहाड़ी कोरवा की जमीन पर कब्जा किया जा रहा है। सरकार हर साल  कोरवा एवं आदिवासी विकास के नाम पर करोड़ों का बजट पेश करती है, योजनाओं की लंबी सूची गिनाई जाती है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलटा है। विकास केवल कागजों तक सीमित है, जबकि असल जिंदगी में आदिवासी और कोरवा समाज  आज भी मूलभूत सुविधाओं और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। समाज के वरिष्ठ लोगों का कहना है कि पहाड़ी कोरवा समाज के लोग चार पीढ़ियों से पूर्वजों के द्वारा जंगल में उपजाऊ लायक बनाई गई जमीन में जीवनयापन कर रहे हैं, इसे बाहरी व्यक्तियों के द्वारा छीना जा रहा है। उच्च अधिकारियों द्वारा बोला जाता है कि उन लोगों से फैसला कर लो और आधे जमीन का बंटवारा  कर लो। कोरवा समाज के लोगों ने कहा कि पीढ़ियों से पूर्वजों के काबिज जमीन को वे किसी और को कैसे दे सकते हैं, जो उनकी जीविका का हिस्सा है। वे पुरखों की जमीन का बंटवारा करने के पक्षधर नहीं हैं। इनका कहना है कि अगर सरकार और प्रशासन उनके लिए कोई पहल नहीं करती है, तो हम आगे अपने स्तर पर लड़ाई लड़ेंगे।
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आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा जमीनी स्तर पर की जाए-बसंत कुजूर
सर्व आदिवासी समाज के जिला अध्यक्ष बसंत कुजूर ने कहा कि पहाड़ी कोरवा दशकों से इस क्षेत्र में बसे हुए हैं और अपनी मेहनत से जमीन को उपजाऊ बनाकर जीवन-यापन कर रहे हैं, लेकिन बाहरी लोग इनकी जमीन पर जबरन कब्जा कर रहे हैं। यह सिर्फ एक गांव की समस्या नहीं है, पूरे जिले में पहाड़ी कोरवा समाज इस पीड़ा से गुजर रहे हैं। उन्होंने शासन-प्रशासन से अपील की है, कि वर्षों से भूमि पर काबिज परिवारों को कानूनी दस्तावेज उपलब्ध कराए जाएं। उनके वन अधिकार पट्टे बनाए जाएं और भू-माफियाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले अपनी जमीन और पहचान दोनों खो देंगे। आदिवासी समाज की पीड़ा को सिर्फ मंचों और घोषणाओं तक सीमित न रखा जाए, बल्कि जमीन पर उतरकर उनके अधिकारों की रक्षा की जाए। अगर जमीन ही इनसे छिन गई, तो उनके पास कुछ भी शेष नहीं रहेगा। इनकी पहचान, भविष्य, और जीने का सहारा छिनने के कगार पा आ जाएगा। ऐसे में इनके साथ कोई अप्रिय घटना घटती है तो पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।

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