सरस्वती शिक्षा महाविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय सेमीनार संपन्न

अंबिकापुर। सरस्वती शिक्षा महाविद्यालय सुभाषनगर, अंबिकापुर में 29-30 मई को दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन ‘सिलिकॉन कक्षा में मानवीय स्पर्श: एक बहुविषयक दृष्टिकोण  हैÓ विषय पर किया गया। कार्यक्रम का परिचय देते हुए महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. श्रद्धा मिश्रा ने कहा कि, दो दिवसीय सेमिनार का मुख्य उद्देश्य आधुनिक तकनीक एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते उपयोग के बीच शिक्षा में मानवीय मूल्यों, संवेदनाओं एवं शिक्षक-विद्यार्थी संबंधों के महत्व को समझना है। वर्तमान समय में डिजिटल शिक्षा, स्मार्ट कक्षाओं और ऑनलाइन शिक्षण के विस्तार ने शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को नई दिशा प्रदान की है, इसके साथ यह आवश्यक हो गया है कि तकनीकी प्रगति के बीच मानवीय संवेदनशीलता, नैतिकता, सहानुभूति और सामाजिक उत्तरदायित्व का समुचित समावेश बना रहे।
मुख्य वक्ता डॉ. पुष्कर दुबे, सहायक प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष प्रबंधन विभाग पंडित सुन्दरलाल शर्मा मुक्त विश्वविद्यालय बिलासपुर ने ऑनलाइन उद्बोधन में एआई के उपयोग की जानकारी विस्तार से दी। उन्होंने कहा हम ऐसे युग में जी रहे हैं जहां कृत्रिम बुद्धिमत्ता, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, कृषि और प्रशासन सहित जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परिवर्तन ला रही है। शिक्षा के क्षेत्र में एआई ने शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को अधिक सरल, प्रभावी और व्यक्तिगत बनाया है। आज स्मार्ट कक्षाएं, वर्चुअल लर्निंग, चैटबॉट, स्वचालित मूल्यांकन और डिजिटल शिक्षण सामग्री विद्यार्थियों को नई सीखने की संभावनाएं प्रदान कर रही हैं। एआई की सहायता से प्रत्येक विद्यार्थी की सीखने की गति, रुचि और आवश्यकता के अनुसार अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराई जा सकती है। शिक्षक विद्यार्थियों की प्रगति का विश्लेषण कर उनकी कमजोरियों और क्षमताओं को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। इससे शिक्षा अधिक समावेशी और गुणवत्तापूर्ण बन रही है, फिर भी एआई शिक्षक का स्थान नहीं ले सकता है। एआई जानकारी दे सकता है, लेकिन प्रेरणा नहीं दे सकता। वह प्रश्नों के उत्तर दे सकता है, लेकिन विद्यार्थियों की भावनाओं को पूरी तरह नहीं समझ सकता। वह डेटा का विश्लेषण कर सकता है, लेकिन मानवीय संवेदनाओं, नैतिक मूल्यों और जीवन के अनुभवों का स्थान नहीं ले सकता। एक शिक्षक केवल ज्ञान का स्रोत नहीं होता, बल्कि वह मार्गदर्शक, प्रेरक और व्यक्तित्व निर्माण का आधार होता है। यही कारण है कि ‘सिलिकॉन कक्षा में मानवीय स्पर्शÓ की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है। तकनीक और मानवीय मूल्यों का संतुलित समन्वय ही भविष्य की शिक्षा की वास्तविक आवश्यकता है।  एआई शिक्षक का विकल्प नहीं, बल्कि सहयोगी के रूप में देखा जाना चाहिए। एआई शिक्षण को अधिक प्रभावी बना सकता है, जबकि शिक्षक उसमें संवेदनशीलता, नैतिकता, रचनात्मकता और मानवीय संबंधों का समावेश करता है। इस दौरान डॉ. पुष्कर दुबे, डॉ. विमल कुमार के अलावा महाविद्यालय की विभागाध्यक्ष रानी रजक, सहायक प्राध्यापक उर्मिला यादव, प्रियलता जायसवाल, मिथलेश कुमार गुर्जर, सुप्रिया सिंह, ज्योत्स्ना राजभर, अर्चना सोनवानी, गोल्डन सिंह, अजीत सिंह परिहार, नितेश कुमार यादव, सुन्दर राम व बीएड द्वितीय सेमेस्टर एवं बीएड चतुर्थ सेमेस्टर के प्रशिक्षणार्थियों की उपस्थिति रही।
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भारत केवल तकनीकी प्रगति का नहीं, गुरु-शिष्य परंपरा का भी देश
विधि विभाग के.ए.ए.एफ. यूनिवर्सिटी, गोमोओ फेटे, काकराबा, कासोआ घाना पश्चिम अफ्रीका के डॉ. प्रदीप शर्मा ने ऑनलाइन संबोधन में कहा कि, आज जब हम तकनीकी युग में आगे बढ़ रहे हैं, तब यह सेमिनार हमें यह संदेश देता है कि शिक्षा में तकनीक का उपयोग आवश्यक है, परंतु मानवीय मूल्यों, संवेदनशीलता और सहानुभूति को बनाए रखना उससे भी अधिक आवश्यक है। यही इस सेमिनार की सबसे बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने कहा भारत विश्व का सबसे युवा और तेजी से डिजिटल होता हुआ देश है। आज डिजिटल इंडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), ऑनलाइन शिक्षा, स्मार्ट कक्षाएं और ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म शिक्षा व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन ला रहे हैं। गांवों से लेकर महानगरों तक तकनीक ने शिक्षा को अधिक सुलभ और प्रभावी बनाया है। नई शिक्षा नीति 2020 ने भी तकनीक के उपयोग को बढ़ावा देते हुए शिक्षा को आधुनिक, समावेशी और कौशल आधारित बनाने पर बल दिया है। विद्यार्थी डिजिटल माध्यमों से विश्वस्तरीय ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं। एआई आधारित शिक्षण, वर्चुअल लैब, डिजिटल पुस्तकालय और ऑनलाइन पाठ्यक्रम शिक्षा के नए आयाम प्रस्तुत कर रहे हैं। किन्तु भारत केवल तकनीकी प्रगति का नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों, संस्कृति और गुरु-शिष्य परंपरा का भी देश है। हमारी शिक्षा व्यवस्था का मूल उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार, संवेदनशील और नैतिक नागरिक का निर्माण करना है। भारतीय संस्कृति में शिक्षक को ज्ञान के साथ-साथ जीवन मूल्यों का मार्गदर्शक माना गया है। यही कारण है कि भारत के संदर्भ में ‘सिलिकॉन कक्षा में मानवीय स्पर्शÓ की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है, तकनीक शिक्षा को गति दे सकती है, एआई विद्यार्थियों के प्रश्नों का उत्तर दे सकता है, परंतु उनके मनोभावों को समझकर प्रेरणा देने का कार्य एक शिक्षक ही कर सकता है।
विशेष आवश्यकता वाले विद्यार्थियों के लिए एआई वरदान
डॉ. विमल कुमार एसोसिएट प्रोफेसर शंकराचार्य प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी भिलाई ने कहा कि एआई शिक्षा को अधिक प्रभावी, सुलभ और आधुनिक बनाता है, लेकिन विद्यार्थियों में नैतिकता, संवेदनशीलता, सहानुभूति और मानवीय मूल्यों का विकास केवल शिक्षक ही कर सकता है। इसलिए एआई का उपयोग शिक्षक के सहयोगी के रूप में होना चाहिए, न कि उसके स्थानापन्न के रूप में। उन्होंने कहा एआई सीखने में सहायता कर सकता है, लेकिन मानवीय भावनाओं, रचनात्मकता, और सहानुभूति की जगह नहीं ले सकता है। वर्तमान समय विज्ञान और प्रौद्योगिकी का युग है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता अर्थात एआई ने शिक्षा के क्षेत्र में नई क्रांति ला दी है। आज एआई की सहायता से विद्यार्थियों को उनकी आवश्यकता और क्षमता के अनुसार व्यक्तिगत शिक्षण उपलब्ध कराया जा रहा है। यह तकनीक विद्यार्थियों की सीखने की गति को समझकर उन्हें उपयुक्त अध्ययन सामग्री प्रदान करती है, जिससे सीखना अधिक प्रभावी और रुचिकर बनता है। एआई का एक महत्वपूर्ण उपयोग त्वरित मूल्यांकन में है। परीक्षा, क्विज और असाइनमेंट का मूल्यांकन कम समय में किया जा सकता है, जिससे विद्यार्थियों को तुरंत फीडबैक प्राप्त हो जाता है। इसके अतिरिक्त एआई आधारित चैटबॉट और वर्चुअल सहायक चौबीसों घंटे विद्यार्थियों के प्रश्नों का समाधान करने में सक्षम हैं। शिक्षकों के लिए भी एआई अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रहा है। यह पाठ योजनाएं, प्रश्नपत्र, नोट्स और प्रस्तुतियां तैयार करने में सहायता करता है। विद्यार्थियों की प्रगति का विश्लेषण कर उनकी कमजोरियों और आवश्यकताओं की पहचान करने में भी मदद करता है। विशेष आवश्यकता वाले विद्यार्थियों के लिए एआई एक वरदान है। भाषा अनुवाद, वॉइस रिकग्निशन और अन्य सहायक तकनीकों के माध्यम से शिक्षा को अधिक समावेशी बनाया जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप शिक्षा सभी के लिए सुलभ और समान अवसर प्रदान करने वाली बन रही है। किन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि एआई केवल एक तकनीकी साधन है। तकनीक और मानवता का संतुलित समन्वय ही भविष्य की शिक्षा का आधार बनेगा।

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