अनोखा है यहां का ‘कठपुतली ब्याहÓ और ‘दसराहाÓ मेला

भारत में गंगा, गोदावरी, यमुना, सरस्वती और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों को जीवनदायिनी मानकर पूजा जाता है। इनमें देव नदी गंगा का स्थान भारतीय जनमानस में सर्वोपरि है। इसी धार्मिक आस्था और लोक-संस्कृति का अनूठा संगम गंगा दशहरा को सरगुजा अंचल में देखने को मिलता है, जहां पारंपरिक श्रद्धा और उल्लास के साथ ‘गंगा दशहराÓ का पर्व और भव्य दशहरा मेला आयोजित किया जाता है। भारत में गंगा, यमुना और गोदावरी जैसी नदियों को सिर्फ पानी का स्रोत नहीं, बल्कि जिंदगी देने वाली ‘प्राणदायिनीÓ माना गया है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश के दिल छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल में गंगा मैया को अपने ही गांव के तालाब में उतार लेने की एक बेहद खूबसूरत और अनूठी परंपरा है? जी हां, जेठ महीने की शुक्ल पक्ष की दशमी को यहां मनाया जाने वाला ‘गंगा दसराहाÓ सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि जल संरक्षण, लोक संस्कृति, मनोरंजन और मानवीय संवेदनाओं का एक अद्भुत उत्सव है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों की अस्थियों के उद्धार के लिए कठोर तपस्या कर देवी गंगा को पृथ्वी पर अवतरित किया था। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को हुए इसी पावन अवतरण की याद में गंगा दशहरा मनाया जाता है।
आदिवासी संस्कृति और जल प्रतिष्ठा का संदेश
गंगा दशहरा का यह पर्व सरगुजा अंचल के आदिवासी समाज और ग्रामीणों की प्रकृति के प्रति कृतज्ञता को दिखाता है। इस दिन से दसों दिशाओं में हरियाली छाने लगती है और बारिश का स्वागत किया जाता है। पानी को पूजने, परंपराओं को सहेजने और आपसी भाईचारे को बढ़ाने का यह ‘सरगुजिहा अंदाजÓ वाकई बेमिसाल और पर्यावरण संरक्षण का सबसे बड़ा संदेश है। कहा जा सकता है कि मेल-जोल भाई चारा, जल संरक्षण, लोक संस्कृति की रक्षा और मनोरंजन का त्योहार है, गंगा दशहरा।
जन्म के नाल से लेकर कमल नाल तक
राज्यपाल पुरस्कृत पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी स्मृति पुरस्कार प्राप्तकर्ता साहित्यकार अजय कुमार चतुर्वेदी ने बताया कि सरगुजा वासियों की यह अटूट आस्था है कि गंगा दशहरे के दिन मैया दूर हिमालय से आकर उनके गांव के उस जलाशय में विराजती हैं, जहां पुरइन (कमल) के पत्ते खिले होते हैं। ग्रामीणों ने चर्चा में बताया कि ‘गंगा जी बहुत दूर हैं, इसलिए हम अपने गांव के तालाब को ही गंगा तुल्य मानकर पूजते हैं और पुण्य कमाते हैं।Ó यह अटूट विश्वास है यहां के ग्रामीणों का। इस दिन साल भर के शुभ कार्यों के प्रतीक जैसे शादी का मौर, कंगन, कलश और यहां तक कि बच्चे के जन्म के समय की नाल व छठी के बाल को गांव के बैगा (पुरोहित) की मौजूदगी में पूरे विधि-विधान से तालाब में विसर्जित (सेराना) किया जाता है। बच्चे की नाल को कमल की जड़ के नीचे गाड़ा जाता है, जो जल और जीवन के गहरे अंतर्संबंध को दर्शाता है।
गुड्डा-गुड़िया का रचाते हैं ब्याह, बच्चों की ‘शादी की पहली पाठशालाÓ
इस त्योहार का सबसे अनोखा और कौतुक जगाने वाला हिस्सा है, कठपुतली विवाह। प्राचीन मनोरंजन की यह विधा यहां की कुंवारी लड़कियों के लिए परंपरा सीखने का जरिया है। तीन दिनों के उत्सव के बीच लकड़ी से बने गुड्डा-गुड्डी का ब्याह पूरे तीन दिनों तक चलता है। मड़वा (मंडप) गाड़ने से लेकर विदाई तक, शादी की हर रस्म बड़े-बुजुर्गों की देखरेख में हूबहू निभाई जाती है। गांव की लड़कियां दुल्हन की मां और लड़के दूल्हे के पिता बनते हैं। इसका मकसद बच्चों को मनोरंजन के साथ-साथ अपनी संस्कृति और संस्कारों से जोड़ना है। दशहरे के दिन इन कठपुतली दूल्हा-दुल्हन को जलाशय में विसर्जित कर दिया जाता है।
दान-पुण्य और सामाजिक समरसता की अनूठी परंपरा
सरगुजा अंचल में गंगा दशहरा मनाने का ढंग बेहद खास और अनूठा है। इस दिन यहां दान-पुण्य को विशेष महत्व दिया जाता है। मेले और विसर्जन के लिए निकलने से पहले ग्रामीण अपने सगे-संबंधियों को आदरपूर्वक घर पर निमंत्रित करते हैं। परंपरा के अनुसार, अपनों को तेल, कपड़े, रोटी और यथाशक्ति नकद राशि दान स्वरूप भेंट करके उन्हें सप्रेम दशहरा मेला घूमने के लिए प्रेरित किया जाता है। यह परंपरा आपसी प्रेम और सामाजिक समरसता को मजबूती देती है।
अलग बाक्स में
पान की लाली, छाते की छांव और ‘दसराहा गीतोंÓ की जुगलबंदी
साहित्यकार अजय चतुर्वेदी ने बताया कि गंगा दशहरा के मौके पर सरगुजा अंचल में 5 दिनों का भव्य मेला लगता है। इस मेले की जान होते हैं, पान के ठेले! इस दिन पान खाने का एक खास महत्व है। जब युवक-युवतियां हाथों में रंग-बिरंगे छाते ताने, मुंह में पान दबाए ‘दसराहा गीतÓ (जिन्हें धंधा या उधुवा गीत भी कहते हैं) गाते हैं, तो मेले का माहौल जीवंत हो उठता है। इन गीतों में सवाल-जवाब और प्यार की नोंक-झोंक होती है।
गीतों की कुछ ऐसी रहती है बानगी
लड़का: ‘पान ला मुह ला करे लाल, बेसी माया ला झिन करबे। एक दिन हो जाही जीव कर काल। चला चली दसराहा मेला देखे ला।।Ó
लड़की: ‘जरइया ला तय जरे-मरे दे, तेर मोर प्रीत ला आगू बढ़े दे। चल चली दसराहा मेला देखे ला।।Ó

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