आजादी के 78 साल बाद भी गांव के लोगों को दुर्दिन का करना पड़ रहा सामना
उदयपुर। विकासखंड अंतर्गत दूरस्थ ग्राम पंचायत पेंडरखी के आश्रित ग्राम पहाड़कोरजा निवासी विकास की धारा से कोषों दूर हैं। आजादी के 78 साल बाद भी इस ग्राम की स्थिति दयनीय है। शासन-प्रशासन की ओर से लगातार ग्रामों की दुर्दशा को दूर करने की पहल की जा रही है, लेकिन घने जंगल के बीच बसे पहाड़कोरजा के लोगों को दुर्दिन का सामना करना पड़ रहा है। इसे देखकर विकास कागजों पर होने की तस्वीर सामने आ रही है। गांव में बिजली की सुविधा नहीं होने से ग्रामीण परेशान हैं। काफी पहले लगाए गए सोलर पैनल की हालत खराब है।
बता दें कि उदयपुर ब्लॉक मुख्यालय से 35 किलोमीटर के फासले पर स्थित ग्राम पंचायत पेंडरखी के आश्रित ग्राम पहाड़कोरजा के लोगों को आज तक बिजली की सुविधा नहीं मिल पाई है। सरकार की ओर से हर घर तक बिजली मुहैया कराने की पहल की गई है। पहाड़कोरजा गांव के लोगों को अंधेरे से मुक्ति दिलाने के लिए सोलर पैनल काफी पहले लगाए गए थे, जो धीरे-धीरे मृतप्राय हो गए हैं। पहाड़कोरजा में लगभग 35 घर हैं, जिसमें निवास करने 90 से अधिक मतदाता हैं, जो समय आने पर विधानसभा से लेकर देश-प्रदेश और गांव की सरकार बनाने में अपने बहुमूल्य मतों का प्रयोग करते आ रहे हैं। इसके बाद भी बदहाल स्थिति के बीच इन्हें समय बिताना पड़ रहा है। ग्रामीण बताते हैं कि बिजली की सुविधा के लिए गांव तक खंभा और तार लगाया गया, इसके बाद उन्हें उम्मीद थी कि अब उन्हें अंधेरे से मुक्ति मिलेगी। एक साल होने को हैं बिजली की सप्लाई नहीं दी गई है। खंभा और तार लगाकर छोड़ दिया गया है। गांव के लोगों की स्थिति पर गौर करें तो शत-प्रतिशत लोग अपनी मांगों को लेकर किसी प्रकार की लड़ाई लड़ पाने की स्थिति में नहीं हैं। चुने गए जनप्रतिनिधि उनकी सुध लेेंगे, इसी आस में जैसे-तैसे ये गुजारा कर रहे हैं। पहाड़कोरजा के ग्रामीणों की उम्मीदें अब अंबिकापुर विधायक व छत्तीसगढ़ सरकार में कैबिनेट मंत्री राजेश अग्रवाल से जुड़ी हैं। इनका लखनपुर क्षेत्र गृहग्राम है, और वे उदयपुर क्षेत्र के ग्रामीण क्षेत्र तक की स्थिति से अच्छे से वाकिफ हैं।
शिक्षा सहित रोजाना के कार्यों पर पड़ रहा प्रभाव
ग्रामीण बताते हैं कि काफी पहले गांव के लोगों को अंधेरे से मुक्ति दिलाने के लिए सोलर पैनल लगाया गया था, जिसकी हालत खराब है। बिजली के अभाव में उन्हें दी जाने वाली सुख-सुविधाएं बेकाम की हैं। इन्हें बरसात के दिनों में सबसे अधिक परेशानी का सामना करना पड़ता है। बरसात के दिनों में धूप कभी-कभी खिलने से सोलर पैनल चार्ज नहीं हो पाता है, जिससे आदिवासी कई दिनों तक इन्हें अंधेरे में रहना पड़ता है। शासकीय भवनों में भी बिजली नहीं है। स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे बिजली के अभाव में रात में विद्यार्थी पढ़ाई नहीं कर पाते हैं। गांव में लोग मिल के अभाव में लकड़ी से निर्मित ढेंकी से धान को चावल में परिवर्तित करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि शहर की चकाचैंध के आगे प्रशासन की नजर ऐसे गांव पर नहीं पड़ रही है, जो कागजों पर आदवासियों के हित के लिए बनी योजनाओं को गति दे सके।

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