लग्जरी वाहनों में फर्राटा भरने वाले जिम्मेदारों को जनसामान्य के स्वास्थ्य की परवाह नहीं
अंबिकापुर। अंबिकापुर-मनेन्द्रगढ़ मार्ग इतनी जर्जर हो गई है कि इस पर चलना काफी मुश्किल है। दोपहिया वाहन से यदि सफर कर लिया तो धूल-धुसरित होना तय है। अगर भारी वाहन के पीछे जा रहे हैं, तो धूल से सराबोर होकर रहेंगे। यही हाल अंबिकापुर से बलरामपुर और लखनपुर की ओर जाने वाली सड़क का है। इसके बावजूद जिम्मेदार पदों पर बैठे जनप्रतिनिधियों व अधिकारियों को आम लोगों की परेशानी नजर नहीं आ रही है, कारण कि वे लग्जरी एसी वाहन में कांच बंद करके आसानी से सफर तय कर लेते हैं। राहगीर धूल खाकर बीमार पड़ रहे हैं। जो लोग इस मार्ग के किनारे निवास करते हैं, उनके मकान, दुकान भी धूल से सने हुए हैं। अपनी परेशानी का ये किससे इजहार करें। सरकार बदली, लेकिन सूरत नहीं बदली। इनसे बात सड़क के दुर्दशा की करें तो ये बेलगाम अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों को कोसने लगते हैं।
शहर में चारों ओर उड़ रही धूल से अस्थमा, एलर्जी से लेकर आंखों में परेशानी के मामले बढ़ रहे हैं। मेडिकल कॉलेज अस्पताल में ऐसे मरीजों की संख्या में इजाफा हुआ है, इसे चिकित्सक भी स्वीकार कर रहे हैं। पहले से अगर कोई इन बीमारियों से पीड़ित है, तो उसकी परेशानी और बढ़ रही है। शहर के अंदर की सड़कों पर नजर डालें, तो सत्तीपारा मार्ग की हालत बदतर हो चुकी है। इसके पीछे कारण अच्छी-खासी सड़क बनने के बाद सीवर लाइन, जलसप्लाई लाइन का विस्तार करना है। शहर व एनएच को जोड़ने वाली कुछ सड़कों की हालत ऐसी है कि यहां 10 मिनट भी गाड़ी खड़ी करके यदि कोई अपना काम निपटाने चले जाए तो वापस लौटने पर उसके वाहन में धूल की परतें चढ़ जाती हैं। अधिकारी और जनप्रतिनिधि लग्जरी वाहनों में निरीक्षण करने आएं तो इस दौरान यातायात व्यवस्था सुनिश्चित करने में लगी पुलिस के कारण बड़े वाहनों की आवाजाही कम हो जाती है। अधिकारी और नेता आम आदमी की तरह दोपहिया वाहन से गुजरें तो उन्हें जन समस्याओं का थोड़ा-बहुत अहसास हो सकता है। खस्ताहाल हो चुकी सड़क पर गड्ढों से बचकर चलने के चक्कर में आए दिन छोटी-बड़ी दुर्घटनाएं हो रही हैं, इसके लिए वाहन चालक नहीं, जर्जर सड़क जिम्मेदार है। वाहनों के पहिए गड्ढे में जाने के बाद नियंत्रण खोने और दुर्घटना की स्थिति आए दिन बनती है।
सांसद ने दोपहिया में किया था सफर
सरगुजा सांसद चिंतामणि महराज एनएच की दुर्दशा को आंकने के लिए पूर्व में दोपहिया में सवार कलेक्टर सहित अन्य जिम्मेदार अधिकारियों के साथ निकले थे। गांधी चौक से सेंट्रल स्कूल के पास तक का सफर उन्होंने कितनी आसानी से तय किया होगा, इससे वे वाकिफ हैं। सड़कों का निरीक्षण करने के लिए आम लोगों की तरह दोपहिया में सवार होकर जिम्मेदारों के साथ निकलने को सराहना भी मिली, लेकिन सड़क की दुर्दशा दूर नहीं हो पाई। ऐसे में इस मार्ग में बसे लोगों और व्यवसायियों का कहना है कि एनएच की दुर्गति दूर करने का ख्याली पुलाव मात्र पकाने से बदतर हालातों का उन्हें सामना करना पड़ रहा है।
गड्ढे में जमा पानी कर रहे बदरंग
बरसात में पानी भरे गड्ढे को पार करती चारपहिया वाहनों के छींटे आम लोगों के साथ ही विद्यार्थियों को बदरंग कर रहे हंै, बारिश न हो तो धूल का रवा स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। बात अंबिकापुर-मनेन्द्रगढ़ मार्ग की करें तो अंबेडकर चौक से कालीघाट के बीच पीजी कॉलेज के अलावा कई निजी शैक्षणिक संस्थान, सेंट्रल स्कूल हंै। छात्रों को खस्ताहाल मार्ग से लेकर जब अभिभावक निकलते हैं, तो वे दुर्घटना की संभावनाओं से सशंकित रहते हैं। खतरे के बीच दोपहिया से रोजाना स्कूल, कॉलेज आने-जाने वाले छात्रों की शिक्षण संस्थान पहुंचते तक सूरत बदल जाती है।
एनएच की हर सड़क बदहाल
शहर से निकले अंबिकापुर-रामानुजगंज रोड की बात करें तो यह भी एनएच की सड़क है। इस मार्ग में कई बसों का ठहराव होता है, जिस कारण यात्री लरंग साय चौक से संजय पार्क के बीच बसों के आने की प्रतीक्षा करते हैं। वहीं संजय पार्क के अलावा इसी मार्ग में काली मंदिर, शंकरघाट होने के कारण लोगों का आना-जाना लगे रहता है। एनएच से लगे कई शासकीय कार्यालय और निजी अस्पताल भी हैं। शाम होते के बाद इस मार्ग में धूल अलग से उड़ती हुई नजर आती है। वाहनों की लाइट के उजाले में धूल छा जाता है, और दुर्घटना का खतरा बने रहता है।
बयान
फोटो-डॉ. शैलेन्द्र गुप्ता
दमा, टीबी के मरीजों के फेफड़े के लिए धूल नुकसानदायक है। इससे रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। हैरानी की बात यह भी है कि ग्रामीण क्षेत्रों में 40 प्रतिशत और अंबिकापुर से 60 प्रतिशत टीबी से ग्रसित मरीज सामने आ रहे हैं। ऐसे में इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि धूल जनसामान्य के स्वास्थ्य को प्रभावित नहीं कर रहा है।
डॉ. शैलेन्द्र गुप्ता, नोडल टीबी रोग विभाग
बयान
फोटो-रजत टोप्पो
धूल उड़ने से आंखों में एलर्जी की समस्या बढ़ रही है। चश्मा लगाने के बाद भी धूल का कण आंखों में प्रवेश कर जाता है, जिससे इंफेक्शन की संभावना बने रहती है। हेलमेट लगाकर लोग निकलें, तो धूल से आंखों का बचाव कुछ हद तक संभव है। राहगीरों और दोपहिया चालकों को ही अधिकतर ऐसी समस्याओं से जूझना पड़ता है। आंख में जलन होने की स्थिति में आंखों को मलने से सूजन की स्थिति बनती है। अस्पताल के नेत्र विभाग में काफी संख्या में आंखों में जलन, चुभन जैसे मामले अधिकतर सामने आ रहे हैं।
डॉ. रजत टोप्पो, नेत्र विशेषज्ञ

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